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क्या प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प खोज लिया है विपक्ष ने

लगातार विपक्ष पर यह कह के हमले किए जा रहे हैं उनके पास कोई दमदार प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार नहीं है इसी बीच जदयू के उपेंद्र कुशवाहा और Hindustani Awam Morcha के जीतन राम मांझी ने जनता दल यूनाइटेड के सहयोगी दल से हैं दोनों लोगों ने अपने बयान में यह बोला है कि नीतीश कुमार पीएम मैटेरियल है नीतीश कुमार भी इस विधानसभा इलेक्शन में यह बयान दे चुके हैं कि मैं आगे से मुख्यमंत्री नहीं बनूंगा तो इसका मतलब क्या लगाया जाए कि शायद वह प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी की तरफ आगे बढ़ रहे हैं

नीतीश कुमार अपनी दावेदारी क्यों पेश कर रहे हैं


देखा जाए तो मोदी के बाद भाजपा में भी कोई प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए प्रमुख चेहरा सामने नहीं है और मोदी जी भी बोल चुके हैं कि मैं 2024 तक ही प्रधानमंत्री रहूंगा| और विपक्ष भी लगातार एक ऐसे इंसान को ढूंढ रहा है जो हर खांचे में फिट बैठे सके देखा जाये तो इस Nitish kumar केंद्र सरकार में भी कैबिनेट मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक का अनुभव है और वह खुद अपने स्टेट विहार के चार बार सीएम रहे हैं कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार विपक्षी उम्मीदवार भी हो सकते हैं और राजद सुप्रीमो तेजस्वी यादव भी बोल चुके हैं कि नीतीश कुमार मुझे सीएम बनाते हैं तो हम उनको पीएम कैंडिडेट के लिए विपक्ष को एकजुट करेंगे | अब देखा यह जाना है कि यह बात कहां तक सच होती है
और अगर जाति के खाचे में फिट कर के देखा जाए तो, से नीतीश कुमार पिछड़े बर्ग से आते जो पूरे भारत में लगभग 60 परसेंट हैं जात के हिसाब से देखा जाए तो भी नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के लिए बिल्कुल फिट बैठते हैं अब यह बात कहां तक सही होती है

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में कुछ उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं –

  • बिहार का गरीबी दर भी लगातार घटा है। 2004-05 में जहां यह 54.4 था वही यह घटकर वर्तमान में 33.74% हो गया।
  • इस तरह से 20.6% की गिरावट दर्ज की गई है।
  • बिहार में शहरीकरण 2001 में जहां 10.48 था वहीं 2011 में बढ़कर केवल 11.3 के दर से रहा इस तरह से मामूली बढ़ोतरी 0.82% की हुई।
  • बिहार में शहरीकरण का दर बेहद कम है यह हमारे बेहतर सुशासन और संतुलित विकास को दर्शाता है।
  • बिहार के लोगों का मासिक, व्यय ग्रामीण इलाकों में 2005 में जहां ₹417 मात्र था वहीं यह वर्तमान में 1127 हो गया है. इस तरह से मासिक व्यय में ₹710 की वृद्धि हुई है।
  • बिहार के शहरी लोगों का मासिक खर्चा 2005 में ₹696 था जो वर्तमान में बढ़कर 1507 हो गया है। इस तरह से ₹811 लोग ज्यादा खर्च कर रहे हैं।
  • इज ऑफ डूइंग बिजनेस में भी बिहार लगातार सुधार किया है। 2015 में बिहार का स्कोर 16.4 था वहीं वर्तमान में बढ़कर 81.91 हो गया है। इस तरह से 65.5 की वृद्धि हुई है।
  • प्रति व्यक्ति आय (GSDP) 2005 में जहां 8773 था वही यह बढ़कर 2019 में 47541 हो गया इस तरह से बिहार में लोगों का प्रति व्यक्ति आय ₹38768 बढ़ा।
  • प्रति व्यक्ति आय एनएसडीपी (NSDP) के अनुसार 2005 में जहां ₹7,914 था वहीं यह बढ़कर 2016- 17 में 25,950 हो गया. इस तरह से ₹18,036 की वृद्धि हुई।

कुशवाहा के बयान से बिहार में चढ़ा सियासी पारा
जेडीयू की तरफ से यह बयान आते ही बिहार की राजनीति में हलचल हो गई है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से ही जेडीयू और बीजेपी के रिश्तों में कई मौकों पर तल्खी देखी जाती रही है। चुनाव जेडीयू 43 सीटों के साथ तीसरे नंबर की पार्टी बनी थी, जिसके बाद भी बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की दखल से उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया है।

तीसरे नंबर की पार्टी के नेता के तौर पर मुख्यमंत्री बनने के बाद भी नीतीश कुमार सरकार में बीजेपी की चलने नहीं दे रहे हैं। इस बात का दर्द बीजेपी के वरिष्ठ नेता और डेप्युटी सीएम तारकिशोर प्रसाद भी जाहिर कर चुके हैं। इसके अलावा कई ऐसे मौके आए जब दोनों दलों के नेताओं के बीच गतिरोध के हालात बने।


पीएम पोस्ट के लिए वैकेंसी ही नहीं है: बीजेपी

उपेंद्र कुशवाहा का बयान आने के बाद बिहार बीजेपी की ओर से कहा गया है प्रधानमंत्री पद के लिए वैकेंसी ही नहीं है तो किसी के बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जेडीयू के नेताओं को एनडीए में रहते हुए इस तरह का बयान देने से बचना चाहिए। वैसे भी लोकसभा चुनाव 2024 में होना है, इसलिए अभी इस बयान को ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है। वैसे भी देश में बयान देने के लिए लोग स्वतंत्र हैं।

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