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स्पेनिश फ्लू की याद दिला रही है कोविड की दूसरी लहर

स्पेनिश फ्लू नाम की इस महामारी से साल 1918 में दुनियाभर के 5० करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे और करीब 2-5 करोड़ लोगों की जान चली गई थी. दुनिया भर में लोगों की मौत के ये आंकड़े प्रथम विश्वयुद्ध में मारे गए सैनिकों व नागरिकों की कुल संख्या से ज्यादा हैं
भारतीय सैनिकों को लेकर एक जहाज 29 मई 1918 को मुंबई के बंदरगाह पर पहुंचा था. यह शिप मुंबई के बंदरगाह पर करीब 48 घंटे तक फंसा रहा. यह समय पहले विश्व युद्ध के समाप्ति का आखिरी दौर था और इस हिसाब से मुंबई का बंदरगाह उस समय काफी बिजी रहता था, उसके बाद भी इस शिप को वहीं खड़ा रहने दिया गया
इसके बाद 10 जून को मुंबई बंदरगाह पर तैनात पुलिस वालों में से 7 पुलिसवालों को हॉस्पिटलाइज किया गया जहां उनमें इन्फ्लूएंजा का संक्रमण मिला. यह भारत में किसी बड़ी संक्रामक बीमारी का पहला हमला था. स्पेनिश फ्लू का भी यह पहला मामला था. यह उस समय पूरी दुनिया में बहुत तेजी से फैल रहा था और मुंबई में स्पेनिश फ्लू के फैलने का खतरा बहुत ज्यादा था क्योंकि यहां पूरी दुनिया से लोग आते थे. साल 1920 के अंत तक स्पेनिश फ्लू से दुनिया में 5 से 10 करोड़ लोग प्रभावित थे

साल 1918 के अप्रैल-मई महीने में स्पैनिश फ़्लू की पहली लहर आई, जो यूरोप के कई देशों में फैली. लेकिन धीरे-धीरे से फ़्लू कम होता गया, लगा मामला ख़त्म होने वाला है, लेकिन ये ‘तूफ़ान आने से पहले की ख़ामोशी’ जैसी थी.

अगस्त, 1918 में स्पैनिश फ़्लू का एक नया म्यूटेंट आया और ये इतना ख़तरनाक साबित हुआ कि किसी ने इसकी कल्पना तक नहीं की थी. यूरोप में ये ऐसे फैला, जैसे जंगल में आग फैल रही हो. ये तो बात थी साल 1918 की. अब ज़रा वर्तमान में आते है और बात भारत की करते हैं.आज यानी 14 अप्रैल मंगलवार 2021 को भारत 1 ,84,372 केस दर्ज किये गये है 1027 मौत हो गयी है कोरोना नया म्युटेंट बिलकुल स्पेनिश फ्लू की तरह कहर बरपा रहा है मरीज़ अस्पताल में अपने इलाज का इंतज़ार कर रहे हैं और तो और दाह संस्कार के लिए मृतकों के परिजनों को लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है.

दुनिया जानीं माना चैनल बीबीसी हिंदी न्यूज़ ने एक रिपोर्ट में देश के ज़्यादा कोरोना संक्रमण वाले राज्य के शवगृहों में काम करने वाले कर्मचारियों और दाह संस्कार के लिए घंटों इंतज़ार करने वाले परिजनों से बात करके ये समझने की कोशिश की कि हालात कैसे हैं.
अभी दोपहर के एक बजकर 10 मिनट हुए हैं और 22 शव अब तक जला चुके हैं, हर दिन 50 से 60 बॉडी जलाना पड़ता है. खाने का तो समझ लीजिए मैडम कि अगर किसी का शव जलने में वक़्त लगा और समय मिल गया तो उसी बीच में खा पाते हैं. छह फ़्रीज़ तो है, लेकिन लोग ज़्यादा आते हैं तो कहाँ फ़्रीज़ में जगह मिलेगी, शव के साथ बाहर लोग खड़े रहते हैं.’’

पुणे के एक सरकारी शवगृह में काम करने वाले वरुण जनगम फ़ोन पर अपनी बात जल्दी-जल्दी बोलते हैं, जैसे कम वक़्त में कितना कुछ बता देना चाहते हों. फिर कहते हैं- मैडम थोड़ा काम है, हम आपको फ़्री होकर कॉल करते हैं.

वरुण देश के उन तमाम शवगृह कर्मियों की झलक अपनी बातों से पेश कर जाते हैं, जो हर दिन, हर मिनट कोरोना से मारे गए लोगों के शव जला रहे हैं.

महाराष्ट्र में मंगलवार को कोरोना के 60,212 नए मामले सामने आए हैं और 281 लोगों की मौत हुई है.

महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, यूपी, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु केरल और कर्नाटक राज्यों में कोरोना तेज़ी से फैल रहा है और कुल कोरोना केस का 80% मामला इन राज्यों से सामने आ रहा है, इनमें भी महाराष्ट्र सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्य है, जहाँ अब एक मई तक कई पाबंदियाँ लगा दी गई हैं.

वरुण बताते हैं कि यूँ तो उनकी शिफ़्ट आठ घंटे रहती है, लेकिन इसके बावजूद काम इतना है कि उन्हें घंटों ओवरटाइम काम करना ही पड़ता है. हालाँकि वह उन कर्मचारियों में से हैं, जिनके पास अपना काम करने के लिए पीपीई किट उपलब्ध है.

शवगृह के कर्मचारी.
बिना पीपीई किट पहने कोरोना शवों को जलाते कर्मचारी
लेकिन गुजरात के राजकोट में कोविड 19 के शवों के लिए अधिकृत श्मशान पर काम करने वाले दिनेशभाई और धीरुभाई संक्रमण से मरने वाले लोगों को बिना किसी पीपीई किट या दस्तानों के जला रहे हैं.

बीबीसी गुजराती के सहयोगी बिपिन टंकारिया को उन्होंने बताया कि कोविड से पहले यहाँ औसतन एक दिन में 12 शव आया करते थे, लेकिन अब 25 शव आते हैं.

दिनेशभाई और धीरुभाई कोरोना से मरने वालों के शव जलाते हैं, लेकिन उन्हें किसी तरह की पीपीई किट नहीं दी गई है, कभी कभी एंबुलेंस के साथ आने वाले अस्पताल के लोग उन्हें दस्ताने दे देते हैं, वरना उनके पास ऐसी कोई सुविधा नहीं दी गई है, जो नियमों के तहत संक्रमित शवों को जलाते वक़्त पहनना ज़रूरी है.

कोविड-19 से संक्रमित लोगों का अंतिम संस्कार करने वाले श्मशान इन दिनों 24 घंटे काम कर रहे हैं.

सूरत के श्मशान घाट का हाल
12 घंटों से अपनों के शवों का इंतज़ार करते लोग
श्मशान पर काम करने वाले कर्मचारी ही केवल परेशान और हताश नहीं हैं, बल्कि वो लोग, जिन्होंने महामारी में अपनों को खोया है, उनके इंतज़ार और दुख भी अंतहीन हैं, ये लोग पहले अपनों के इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाते हैं और फिर मौत हो जाने की स्थिति में उन्हें शव के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है.

दरअसल, अस्पताल भी श्मशान की स्थिति देखते हुए शवों को देरी से सौंप रहे हैं.

बीबीसी ने ऐसे ही एक परिवार से बात की. गुजरात में राजकोट के पास स्थित मोरबी से आए हुए हेमंत जादव ने बीबीसी गुजराती को बताया कि उनके रिश्तेदार के शव के लिए उन्हें 12 घंटे तक ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ा.

सोमवार को सुबह पाँच बजे वे राजकोट के सिविल अस्पताल आए और शाम के सात बजे जब वे बीबीसी से बात कर रहे थे, तब तक उन्हें अपने भाई का शव नहीं मिल सका था.

हेमंत के भाई कोरोना वायरस से संक्रमित थे और एक अप्रैल से राजकोट सिविल हॉस्पिटल में भर्ती थे. हेमंत ने बताया, ‘’फोन पर बात हुई थी तब मेरे भाई की तबीयत में सुधार आ रहा है, ऐसा हमें लग रहा था कि वो अब ठीक होकर घर आएँगे, पर उसके बाद हॉस्पिटल से फ़ोन आया कि उनका निधन हो गया है.’’

सरकारी आँकड़ों की मानें, तो बीते 24 घटों में गुजरात में 6690 नए कोरोना केस सामने आए हैं और 67 लोगों की मौत हुई है. राज्य में कुल 33,000 सक्रिय मामले हैं.

ख़ासकर अहमदाबाद, सूरत और राजकोट सबसे बुरी तरह प्रभावित शहर हैं. सूरत के शवगृहों में लंबी क़तारों में खड़े लोग अपनों की आख़िरी यात्रा का इंतज़ार कर रहे हैं, लोगों को टोकन दे कर घंटों लंबा इंतज़ार करवाया जा रहा है.

अस्पतालों में बेड
इमेज स्रोत,REUTERS/FRANCIS MASCARENHAS
यूपी में कोरोना से मरते लोग और फ़ेल होता सिस्टम

बीबीसी हिंदी के सहयोगी समीरात्मज मिश्र ने लखनऊ से जानकारी दी है कि यूपी में कोरोना की दूसरी लहर में बड़ी संख्या में कोरोना के केस सामने आ रहे हैं.

राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कोरोना संक्रमित हो गए हैं.

ख़ासकर यूपी की राजधानी लखनऊ में कोरोना वायरस का संक्रमण जहाँ लोगों पर क़हर बनकर टूटा है, वहीं संक्रमण से मरने वालों के अंतिम संस्कार के लिए भी जगह और सुविधाओं की कमी पड़ गई है. लखनऊ के दो घाटों के अलावा कई अन्य शहरों में भी लोगों को अपने मृत परिजनों के दाह संस्कार के लिए घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है.

लखनऊ के बैकुंठ धाम शवदाहगृह का आलम यह है कि दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ रही हैं और घाटों पर शवों को जलाने के लिए भी कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं. मंगलवार को अपने एक रिश्तेदार का दाह संस्कार करने गए देवेश सिंह ने बताया कि उन लोगों को ख़ुद ही हर चीज़ की व्यवस्था करते हुए दाह संस्कार करना पड़ा.

लखनऊ में कोरोना संक्रमण से मृत लोगों के दाह संस्कार के लिए बैकुंठ धाम और गुलाला घाट पर कोविड प्रोटोकॉल के तहत इंतज़ाम किया गया है, लेकिन इन घाटों पर सामान्य मौत वाले शवों का भी अंतिम संस्कार हो रहा है. ऐसी स्थिति में इन लोगों को अंतिम संस्कार के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ रहा है.

कोरोना
इमेज स्रोत,EPA/RAJAT GUPTA
बैकुंठ धाम के बाहर एंबुलेंस और गाड़ियों की भले ही लाइन लगी हो और लोग घंटों इंतज़ार कर रहे हों लेकिन नगर निगम के मुख्य अभियंता विद्युत यांत्रिक राम नगीना त्रिपाठी इस बात से इनकार करते हैं.

वो कहते हैं, “विद्युत शवदाह गृह के अंतिम संस्कार पर एक से डेढ़ घंटे का समय सामान्य तौर पर लगता है. इसमें 45 मिनट मशीन में लगते हैं और उतना ही वक़्त सैनिटाइजेशन और तैयारी में लगते हैं. इस समय बैकुंठधाम पर दो और गुलाला घाट पर एक विद्युत शवदाह गृह हैं. इसके अलावा संक्रमित शवों को जलाने के लिए आठ-आठ अतिरिक्त लकड़ी वाले स्थल भी शुरू किए गए हैं.”

दो दिन पहले अपने एक परिजन का अंतिम संस्कार करके लौटे शक्तिलाल त्रिवेदी बताते हैं कि टोकन लेने के बावजूद उनका नंबर क़रीब छह घंटे के बाद आया और अंतिम संस्कार पूरा होते-होते दस घंटे लग गए.

लखनऊ के विद्युत शवदाह गृह में काम करने वाले एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आँकड़े चाहे जो हों, लेकिन लखनऊ के दोनों घाटों पर कोरोना संक्रमण से मरने वालों के शव उससे कहीं ज़्यादा आ रहे हैं.

उन्होंने दावा किया कि सोमवार को इस तरह के 100 से भी ज़्यादा शवों का दाह संस्कार किया गया.

हालांकि क्रिमोटोरियम में दर्ज सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, लखनऊ में सोमवार को कोरोना से जान गँवाने वाले 77 लोगों का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें बैकुंठ धाम पर 40 और गुलाला घाट पर 37 लोगों का दाह संस्कार हुआ.

वहीं यूपी सरकार के सोमवार के आँकड़े कहते हैं कि इस दिन 72 लोगों की संक्रमण से मौत हुई और 13,685 नए कोरोना के मामले सामने आए थे.

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